साथियों, नमस्कार।
आज मैं आप सभी के समक्ष “श्रमिक उत्थान एवं सामाजिक कल्याणकारी एसोसिएशन” के एक ऐसे उल्लेखनीय योगदान का उल्लेख करना चाहता हूँ, जिसे जानकर आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं। इसका लाभ केवल मैंने ही नहीं, बल्कि आपमें से अनेक लोगों ने भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया है। फिर भी अधिकांश लोग आज तक इसे केंद्र सरकार की एक उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में ही जानते हैं। जबकि मेरे विचार में इस महत्वपूर्ण पहल का श्रेय संस्था के अध्यक्ष श्री रवि जी. निगम को जाता है।
अब आप यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि आखिर वह कौन-सा योगदान था।
कोरोना काल की अभूतपूर्व चुनौती
कोरोना महामारी के दौरान जब अचानक देशव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया, तब सरकार के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती खड़ी हो गई थी। देश के विभिन्न भागों में लाखों प्रवासी मजदूर, कर्मचारी, विद्यार्थी और आम नागरिक अपने घरों से दूर फँस गए थे।
उस समय देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने देशवासियों से अपील की थी कि वे जहाँ हैं वहीं रहें, सुरक्षित रहें और राशन अथवा आवश्यक वस्तुओं की चिंता न करें, क्योंकि देश के पास पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। यह बात सभी को स्मरण होगी।
बढ़ती हुई मानवीय समस्या
किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया, परिस्थितियाँ लगातार गंभीर होती चली गईं। लोग अपने परिवारों के पास लौटना चाहते थे और उनके परिजन भी उनकी सुरक्षा को लेकर अत्यंत चिंतित थे।
सरकार परिवहन सेवाएँ प्रारंभ करने को लेकर सतर्क थी, क्योंकि उसे आशंका थी कि यदि ट्रेनें और बसें शुरू कर दी गईं तो भारी भीड़ एकत्र हो सकती है, जिससे महामारी की स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है। परिणामस्वरूप लोगों को यथास्थान रोकने का प्रयास किया गया।
दूसरी ओर, प्रवासी मजदूरों और आम नागरिकों की बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही थी। अनेक स्थानों पर भोजन और आवश्यक संसाधनों की कमी महसूस होने लगी। ऐसे कठिन समय में स्वयंसेवी संस्थाएँ और सामाजिक संगठन लोगों की सहायता के लिए आगे आए। अंततः अनेक लोग पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़े। प्रारंभिक घटनाएँ गुजरात में देखने को मिलीं और बाद में मुंबई के बांद्रा क्षेत्र की घटना ने पूरे देश का ध्यान इस संकट की ओर आकर्षित किया।
संकट की पूर्व चेतावनी
मेरे अनुसार, श्री रवि जी. निगम ने लॉकडाउन लागू होने के लगभग पाँच दिनों के भीतर ही इस संभावित संकट का अनुमान लगा लिया था।
संस्था के समाचार पोर्टल में प्रकाशित संपादकीय लेखों के माध्यम से उन्होंने यह चेतावनी दी थी कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो प्रवासी मजदूरों और आम नागरिकों के बीच व्यापक असंतोष तथा बड़े पैमाने पर पलायन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
दुर्भाग्यवश उस समय इन चेतावनियों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
14 अप्रैल 2020 का महत्वपूर्ण सुझाव
इसके पश्चात 14 अप्रैल 2020 को श्री रवि जी. निगम ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, गृह मंत्री श्री अमित शाह जी, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तथा प्रमुख विपक्षी नेताओं को ईमेल के माध्यम से एक विस्तृत एसओपी (Standard Operating Procedure) भेजी।
इस प्रस्ताव में प्रमुख रूप से निम्न सुझाव सम्मिलित थे—
- प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष ट्रेनों की व्यवस्था।
- मनरेगा के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने की योजना।
- संकट प्रबंधन हेतु समन्वित राष्ट्रीय कार्ययोजना।
उल्लेखनीय है कि इसी दिन बांद्रा की चर्चित घटना भी सामने आई थी।
श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की शुरुआत
अगले ही दिन, 15 अप्रैल से मनरेगा से संबंधित सकारात्मक संकेत दिखाई देने लगे और बाद में प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष ट्रेनों को प्रारंभ करने की घोषणाएँ सामने आईं।
आने वाले महीनों में इन्हीं सेवाओं को “श्रमिक स्पेशल ट्रेन” के नाम से प्रारंभ किया गया, जिनके माध्यम से लाखों प्रवासी मजदूरों और नागरिकों को उनके गृह राज्यों तक पहुँचाया गया।
आपदा प्रबंधन समिति का प्रस्ताव
उस समय महामारी प्रबंधन का अधिकांश नियंत्रण प्रधानमंत्री और गृह मंत्री स्तर पर केंद्रित था।
श्री रवि जी. निगम ने एक समर्पित “आपदा प्रबंधन समिति” के गठन का सुझाव दिया। उनका मत था कि इस समिति में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, पेशेवरों और गैर-राजनीतिक व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाए, ताकि राहत कार्यों और नीतियों को अधिक प्रभावी, संतुलित और जवाबदेह बनाया जा सके।
इस विषय में सर्वोच्च न्यायालय को भी पत्र लिखे जाने का उल्लेख किया गया। बाद में आपदा प्रबंधन की व्यवस्थाएँ अधिक संगठित रूप में विकसित हुईं, यद्यपि उनका संचालन मुख्यतः सत्ताधारी तंत्र के हाथों में ही बना रहा।
पर्दे के पीछे किया गया कार्य
ये ऐसे प्रयासों के उदाहरण हैं जो पर्दे के पीछे रहकर किए गए और जिन्हें सार्वजनिक स्तर पर बहुत कम पहचान मिली।
बाद में “श्रमिक स्पेशल ट्रेन” सेवाएँ प्रारंभ हुईं और राजनीतिक स्तर पर उनका व्यापक प्रचार भी हुआ। किन्तु मेरे विचार में उन सुझावों और प्रयासों का समुचित उल्लेख कभी नहीं किया गया, जिन्होंने इस दिशा में सोच और समाधान प्रस्तुत करने का कार्य किया था।
इतिहास में उचित स्थान का प्रश्न
मेरा मानना है कि जिन सुझावों और प्रयासों ने देश के भीतर ही नहीं, बल्कि विदेशों में फँसे नागरिकों की वापसी के लिए भी मार्ग प्रशस्त करने में योगदान दिया, उन्हें इतिहास में उनका उचित स्थान मिलना चाहिए।
यदि समय रहते ऐसे कदम न उठाए जाते, तो मानवीय संकट कहीं अधिक गहरा हो सकता था और आर्थिक स्थिति भी कहीं अधिक गंभीर रूप धारण कर सकती थी। उस समय देश की जीडीपी पहले से ही अभूतपूर्व गिरावट का सामना कर रही थी और परिस्थितियाँ और अधिक चुनौतीपूर्ण बन सकती थीं।
राजनीति और जनहित में अंतर
साथियों, यही वह अंतर है जो केवल राजनीति करने और वास्तविक जनहित में कार्य करने के बीच दिखाई देता है।
यदि कोई सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक संस्था बिना किसी सरकारी पद, राजनीतिक शक्ति अथवा प्रशासनिक अधिकार के भी सार्थक सुझाव और समाधान प्रस्तुत कर सकती है, तो कल्पना कीजिए कि जनसमर्थन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व मिलने पर वह समाज के लिए कितना बड़ा परिवर्तन ला सकती है।
हमारा आह्वान
इसी विश्वास के साथ मैं देश के सभी श्रमिक भाइयों, किसान भाइयों, कर्मचारियों, युवाओं और जागरूक नागरिकों से आग्रह करता हूँ कि वे एकजुट होकर इस अभियान से जुड़ें।
- संगठन को मजबूत बनाएं।
- स्वयंसेवक बनें।
- सदस्यता ग्रहण करें।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग प्रदान करें।
हमारा संकल्प
आइए, हम सब मिलकर ऐसी व्यवस्था के निर्माण में योगदान दें जहाँ श्रम का सम्मान हो, न्याय सुलभ हो, अवसर समान हों और जनहित सर्वोच्च प्राथमिकता हो।
धन्यवाद।
अखिल भारतीय श्रमिक पार्टी (ABSP)
श्रमिकों, किसानों और आमजन के अधिकारों के लिए समर्पित।
त्रिभुवन यादव
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कार्यकारणी सदस्य