देश की वास्तविक उन्नति तभी संभव है, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम, आत्मनिर्भर एवं सम्मानजनक जीवन जीने योग्य बने। श्रमिकों, किसानों, युवाओं एवं आमजन को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन लाना अत्यंत आवश्यक है। सरकार का उद्देश्य ऐसी आर्थिक व्यवस्था स्थापित करना होगा, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर, सम्मानजनक रोजगार एवं बेहतर जीवन स्तर प्राप्त हो सके।
श्रमिक की वास्तविक परिभाषा
समाज में “श्रमिक” शब्द को केवल बोझा ढोने वाले मजदूर तक सीमित कर देखना एक बहुत बड़ी भूल है। श्रमिक वह प्रत्येक व्यक्ति है, जो अपनी शारीरिक, मानसिक अथवा बौद्धिक क्षमता के माध्यम से श्रम करता है और अपने तथा अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए श्रम से अर्जित आय पर निर्भर रहता है।
चाहे वह किसान हो, शिक्षक हो, इंजीनियर हो, डॉक्टर हो, कर्मचारी हो, चालक हो, तकनीशियन हो, निजी क्षेत्र में कार्यरत व्यक्ति हो अथवा सरकारी कर्मचारी — प्रत्येक वह व्यक्ति श्रमिक है, जो अपने श्रम के माध्यम से जीवनयापन करता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो देश की लगभग 95% जनता श्रमिक वर्ग से जुड़ी हुई है, जबकि समाज का एक छोटा वर्ग श्रमिकों के श्रम से उत्पन्न संसाधनों एवं व्यवस्था का लाभ लेकर विलासिता पूर्ण जीवन जीता है।
समान काम — समान दाम
असंगठित एवं संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के बीच की असमानता को समाप्त किया जाएगा। “समान काम — समान दाम” की व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू किया जाएगा, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को उसके श्रम के अनुरूप उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा, सम्मान एवं अधिकार प्राप्त हो सकें। श्रमिकों के शोषण को रोकने के लिए श्रम कानूनों को अधिक मजबूत, पारदर्शी एवं प्रभावी बनाया जाएगा।
श्रम का सम्मान — राष्ट्र की शक्ति
एक कटु सत्य यह भी है कि श्रमिक अर्थात श्रम करने वाला व्यक्ति — चाहे वह सरकारी सेवा में हो या निजी क्षेत्र में — अंततः अपने श्रम के माध्यम से ही जीवनयापन करता है। वह संगठित क्षेत्र से जुड़ा हो या असंगठित क्षेत्र से, कार्य तो उसे करना ही होता है। इसलिए श्रम को छोटा या बड़ा मानने की मानसिकता को समाप्त करना आवश्यक है।
समाज को यह समझना होगा कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति श्रम करने वाले लोगों से ही निर्मित होती है। अब यह स्वयं लोगों को तय करना होगा कि वे अपने आपको किस श्रेणी में देखते हैं — श्रम करने वाले बहुसंख्यक समाज के साथ या श्रम का लाभ लेने वाले सीमित वर्ग के साथ।
शिक्षा को आर्थिक सशक्तिकरण का आधार बनाना
शिक्षा क्षेत्र को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि जब तक समाज शिक्षित एवं जागरूक नहीं होगा, तब तक देश पूर्ण रूप से उन्नति नहीं कर सकता। शिक्षा ही व्यक्ति को उसके कर्तव्यों, अधिकारों एवं दायित्वों का बोध कराती है और बेहतर जीवन जीने की क्षमता प्रदान करती है।
आज प्रत्येक कार्य के लिए योग्यता एवं कौशल आवश्यक है। जिस व्यक्ति की शिक्षा एवं प्रशिक्षण बेहतर होगा, उसे उसी अनुरूप बेहतर रोजगार एवं सम्मानजनक आय प्राप्त होगी। अच्छी शिक्षा से बेहतर रोजगार, बेहतर वेतन एवं उच्च जीवन स्तर सुनिश्चित होता है। इसलिए प्रत्येक नागरिक तक गुणवत्तापूर्ण एवं समान शिक्षा पहुंचाना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होगी।
स्वास्थ्य और आर्थिक विकास का संबंध
स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना भी आर्थिक सशक्तिकरण के लिए अत्यंत आवश्यक है। “निरोगी तन, स्वस्थ मन” ही व्यक्ति की कार्य क्षमता, ऊर्जा एवं बौद्धिक विकास का आधार होता है। जब व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होता है, तब वह अधिक स्फूर्ति, दक्षता एवं सकारात्मकता के साथ कार्य कर सकता है।
स्वस्थ समाज की कार्यक्षमता अधिक होती है, जिससे उत्पादन क्षमता, रोजगार और आर्थिक विकास स्वाभाविक रूप से बढ़ते हैं। इसलिए आमजन को सुलभ, गुणवत्तापूर्ण एवं निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व होगा।
बंद कारखानों को पुनः शुरू कर रोजगार सृजन
बंद पड़े कारखानों एवं उद्योगों को पुनः शुरू करने के लिए सरल, सक्षम एवं पारदर्शी नियम एवं कानून स्थापित किए जाएंगे। श्रमिकों एवं उद्योग मालिकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर उत्पादन इकाइयों को पुनर्जीवित किया जाएगा, ताकि बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सकें।
उद्योगों के पुनः संचालन से श्रमिकों को रोजगार मिलेगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और समाज का प्रत्येक वर्ग आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बन सकेगा। यह श्रमिकों के उत्थान एवं राष्ट्र की आर्थिक प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक कदम होगा।
सरकारी औद्योगिक संस्थानों एवं उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, मजबूत एवं सक्षम बनाने के लिए सरकार द्वारा नए औद्योगिक संस्थानों, उत्पादन इकाइयों एवं सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना की जाएगी। उद्योगों के विकास को केवल निजी क्षेत्र तक सीमित न रखकर राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता को बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जाएगा, ताकि बड़े स्तर पर रोजगार सृजन हो सके और देश की आर्थिक स्थिति मजबूत बन सके।
सरकार ऐसी औद्योगिक एवं आर्थिक नीतियाँ लागू करेगी, जिनसे देश आयात पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय निर्यात क्षमता को बढ़ा सके। “उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था” को मजबूत कर देश में निर्माण, तकनीक, कृषि आधारित उद्योग, लघु एवं मध्यम उद्योग तथा श्रम आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
जब देश अधिक उत्पादन करेगा, आत्मनिर्भर बनेगा और विश्व बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ाएगा, तभी राष्ट्र वास्तविक अर्थों में आर्थिक रूप से सबल एवं सक्षम बन सकेगा। उत्पादन, रोजगार और निर्यात आधारित विकास मॉडल ही मजबूत राष्ट्र निर्माण की आधारशिला सिद्ध होगा।
आर्थिक समता — राष्ट्र निर्माण का आधार
सरकार ऐसी आर्थिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध होगी, जिसमें प्रत्येक नागरिक को उसकी योग्यता, श्रम एवं क्षमता के अनुसार अवसर प्राप्त हो सके। आर्थिक असमानता को कम कर श्रमिकों, किसानों, युवाओं एवं आमजन को आत्मनिर्भर एवं आर्थिक रूप से सक्षम बनाना ही राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार होगा।

